दृश्य से अदृश्य की ओर: प्रकृति से चेतना तक

 


जयपुर की वरिष्ठ चित्रकार डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला की एकल चित्रकला प्रदर्शनी 14 से 20 सितंबर 2026 तक मुंबई में
जयपुर की वरिष्ठ चित्रकार डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला की एकल चित्रकला प्रदर्शनी ‘दृश्य से अदृश्य की ओर’ का आयोजन 14 से 20 सितंबर 2026 तक मुंबई के जहांगीर आर्ट गैलरी स्थित हीरजी गैलरी में किया जा रहा है। यह प्रदर्शनी प्रकृति को देखने की कलाकार की उस गहन दृष्टि और रचनात्मक यात्रा को प्रस्तुत करती है, जहाँ प्रकृति केवल बाहरी दृश्य यथार्थ नहीं रह जाती, बल्कि आंतरिक अनुभूति, संवेदना और गहन बोध का माध्यम बन जाती है।



‘दृश्य से अदृश्य की ओर’ केवल प्रकृति के चित्रण की यात्रा नहीं, बल्कि कलाकार की विकसित होती दृष्टि, संवेदनशीलता और जीवनानुभवों का प्रतिबिंब है। डॉ. शुक्ला के अनुसार, कलाकार की रचनात्मक यात्रा के प्रारंभिक चरण में दृश्य संसार को स्पष्टता और यथार्थवाद के साथ प्रस्तुत करने की स्वाभाविक इच्छा होती है। लेकिन जैसे-जैसे दृष्टि, संवेदना और अनुभव परिपक्व होते हैं, चित्रों में अनावश्यक विवरण धीरे-धीरे पीछे छूटने लगते हैं। अंततः कुछ रेखाएँ, रंग और भाव ही उस संपूर्ण अनुभूति को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त हो जाते हैं।



डॉ. शुक्ला के लिए यह सरलता केवल दृश्य रूप का परिवर्तन नहीं, बल्कि बाह्य से आंतरिक और दृश्य से अदृश्य की ओर बढ़ती एक आध्यात्मिक यात्रा है। उनके लिए प्रकृति केवल वह नहीं है जो आँखों को दिखाई देती है, बल्कि उस चेतना की अनुभूति भी है जो उसके दृश्य रूपों के पीछे शांत भाव से स्पंदित होती रहती है। इसीलिए उनकी कृतियों में जैसे-जैसे दृश्य विवरण कम होते जाते हैं, वैसे-वैसे अनुभव की गहराई और अधिक मुखर होती जाती है।

यह दृष्टिकोण केवल चित्रकला तक सीमित नहीं है। मूर्तिकला, नृत्य, कविता और ललित कला के प्रत्येक रूप में रचनात्मक परिपक्वता इसी क्षमता से प्रकट होती है कम में अधिक कहना, सीमित रंगों में व्यापक भाव व्यक्त करना और दृश्य जगत को अदृश्य के द्वार के रूप में प्रस्तुत करना।



प्रदर्शनी की यात्रा पॉट में सजे फूलों के स्थिर-जीवन (Still Life) चित्रों में एक विशेष ऊँचाई प्राप्त करती है। यहाँ प्रकृति किसी विस्तृत परिदृश्य के रूप में नहीं, बल्कि एक सीमित स्थान में सिमटकर अत्यंत सहज और सामंजस्यपूर्ण उपस्थिति ग्रहण करती है। फूलों और रंगों की यह संरचना विविधता में एकता तथा सीमा के भीतर पूर्णता का अनुभव कराती है। प्रकृति का बाहरी संसार यहाँ धीरे-धीरे एक आंतरिक, शांत और सुखद अनुभूति में परिवर्तित होता दिखाई देता है।

इस प्रकार ‘दृश्य से अदृश्य की ओर’ प्रकृति को केवल देखने से आगे बढ़कर उसे महसूस करने की यात्रा है एक ऐसी यात्रा जिसमें दृश्य रूप धीरे-धीरे सरल होता जाता है, जबकि उसके पीछे छिपा अदृश्य सत्य और अधिक स्पष्ट होकर सामने आता है।
कला, अंततः केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि भीतर अनुभव करने की अनुभूति है। और प्रकृति से चेतना तक की यही यात्रा इस प्रदर्शनी का मूल तत्व है।

Post a Comment

Previous Post More 4 Post